Wednesday, 12 September 2012

ग़ज़ल 8 2 ( सपने हमारे सच अगर होते नहीं ) - लोक सेतिया "तनहा"

सपने हमारे सच अगर होते नहीं - लोक सेतिया "तनहा"

सपने हमारे सच अगर होते नहीं ,
हम मुस्कुराते हैं कभी रोते नहीं।

हैं तीरगी से प्यार करने लग गये ,
अब रात भर कुछ लोग हैं सोते नहीं।

हो राह ग़म की या ख़ुशी की हो डगर ,
बस ज़िंदगी में नाखुदा होते नहीं।

तुम मत समझ लेना उसे इक बागबां ,
जो फूल चुनते हैं मगर बोते नहीं।

जीना यहीं है और मरना भी यहीं ,
पर ज़िंदगी में और समझौते नहीं।

"तनहा" रहो आज़ाद उनकी कैद से ,
जैसे भी हो, अपनी खुदी खोते नहीं।

( तीरगी :::::अंधेरा  )         (  नाखुदा :::::::: कश्ती वाला )

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