Thursday, 13 September 2012

आंधियां चलती रहीं , दीप जलता ही रहा ( गीत ) 7 ( डॉ लोक सेतिया )

 दीप जलता ही रहा ( गीत ) लोक सेतिया

आंधियां चलती रहीं ,
दीप जलता ही रहा।

ज़िंदगी के फासले कम कभी हो न सके 
दर्द तो मिलते रहे हम मगर रो न सके
ग़म से पैमाना भरा जब न खाली हो सका
वो समंदर बन गया बस उछलता ही रहा।
आंधियां चलती ........................

पूछते सब से रहे आपका हम तो पता
है हमारा ख्वाब कोई तो देता ये बता
छोड़ कर हम कारवां आ गए खुद ही यहां
इक सफ़र था ज़िंदगी जो कि चलता ही रहा।
आंधियां चलती ...........................

जब किसी ने साथ छोड़ा ,नहीं कुछ भी कहा
शुक्रिया आपका आपने जो भी दिया
जब भी वो देता रहा जाम भर भर के हमें
जाम हाथों से मेरे बस फिसलता ही रहा।
आंधियां चलती ............................

पास हमको लोग सारे बुलाते तो रहे
और हम रस्मे वफा कुछ निभाते तो रहे
दिल हमारा तोड़ डाला किसी ने जब भी
आंसुओं का एक सागर निकलता ही रहा।
आंधियां चलती रहीं ,दीप जलता ही रहा।

 मेरे दोस्त जवाहर लाल ठक्क्र जी ने मिसरा दिया था गीत का। 





              

No comments: