Wednesday, 19 September 2012

कवि नहीं मर सकता ( हास्य व्यंग्य कविता ) 7 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

कवि नहीं मर सकता  ( हास्य-व्यंग्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

चला रहे हो कविवर
शब्दों के तुम तीर ,
आखिर कब समझोगे
श्रोताओं की पीर।

कविता से अनजान थे लोग ,
बस कवि से परेशान थे लोग ,
क्या क्या कहता है जाने ,
सुन सुन कर हैरान थे लोग ,
कविता से बच न पाते ,
कुछ ऐसे नादान थे लोग।

खुद ही बुला आए उसको ,
अब जिससे परेशान थे लोग।

कविताओं से लगता डर ,
वो भी आखिर इंसान थे लोग  ,
उनको भाता नहीं था कवि  ,
पर कवि के दिलोजान थे लोग।

कवि ने मरने का भी
कई बार इरादा किया ,
लेकिन हर बार फिर
जीने का वादा किया।

कवि की हर कविता
फटा हुआ थी ढोल ,
खोलती थी रोज़ ही
किसी न किसी की पोल।

कवि ने भाईचारे पर
कविता एक सुनाई  ,
हो गई जिससे घर घर में
थी लड़ाई ,
बाढ़ में डूबे हुए थे
कितने तब घर ,
जब लिखी कवि ने
कविता सूखे पर ,
कविता बरसात से
बरसा ऐसा पानी ,
आ गई तब याद
हर किसी को नानी।

धर्म निरपेक्षता समझा कर
लिया कवि ने पंगा ,
भड़क उठा उस दिन
साम्प्रदायिक दंगा।

प्रेम रोग पर
कविता क्या सुनाई ,
कई नवयुवकों ने थी
कन्या कोई भगाई।

झेल रहे थे सभी
जब सूखे की मार ,
शीर्षक तब था
कविता का बसंत बहार।

सुन ख़ुशी के अवसर पर
उसकी कविता धांसू ,
निकलने लगे श्रोताओं के आंसू।

इतनी लम्बी कविता
उसने इक दिन सुनाई ,
मुर्दा भी उठ बोला
बस भी करो भाई।

श्रोताओं पर कवि ने
सितम बड़े ही ढाए ,
जिसके बदले में उसने
जूते चप्पल पाए।

कहीं से इक दिन
लहर ख़ुशी की आई ,
कवि के मरने की
वो खबर जो पाई  ,
कवि की मौत का
सब जश्न मना रहे थे  ,
बड़े दिनों के बाद
सारे मुस्कुरा रहे थे ,
उसने फिर से आ
सब को डराया ,
जिन्दा जब वापस
कवि लौट आया।

प्यार करते मुझसे
समझ लिया कवि ने ,
दुखी देखा जब
सबको वहां कवि ने।

सब ने मिलकर कहा
करो इतना वादा ,
कविता तब सुनाना
जब हो मरने का इरादा ,
तेरे मरने की अच्छी खबर थी आई ,
इसी बात पर थी ,
ख़ुशी की लहर छाई।

कवि ने समझाया बेकार हंसे
बेकार ही तुम सब हो रोये ,
कवि को मरा तभी मानिये
जिस दिन तेरहवां कवि का होय।






















तेरे साथ हम सब की होती भलाई ,
अपनी ख़ुशी का ये राज़ जब सबने खोला ,
मैं नहीं अभी मरने वाला तब कवि था बोला !!
कवि मरा ये जानकर खुश न होना कोय ,
कवि मरा तब मानिये जिस दिन तेहरवां होय !!

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