Sunday, 16 September 2012

ग़ज़ल 7 4 ( प्यार भरे कुछ जाम रखे हैं ) - लोक सेतिया "तनहा"

 प्यार भरे कुछ जाम रखे हैं - लोक सेतिया "तनहा"

प्यार भरे कुछ जाम रखे हैं ,
आज तुम्हारे नाम रखे हैं।

जिनको खरीद सका न ज़माना ,
अब खुद ही बेदाम रखे हैं।

पत्थर चलने की खातिर भी ,
शीशे वाले मुकाम रखे हैं।

खुद ही अपनी रुसवाई के ,
हमने चरचे आम रखे हैं।

जिन पर बातें दिल की लिखीं हैं ,
ख़त वो सभी बेनाम रखे हैं।

घर पर जा कर देखो "तनहा" ,
राज़ कई खुले-आम रखे हैं।

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