Saturday, 1 September 2012

ग़ज़ल 7 3 ( जिन के ज़हनों में अँधेरा है बहुत ) - लोक सेतिया "तनहा"

जिन के ज़हनों में अंधेरा है बहुत - लोक सेतिया "तनहा"

जिन के ज़हनों में अंधेरा है बहुत ,
दूर उन्हें लगता सवेरा है बहुत।

एक बंजारा है वो , उसके लिये ,
मिल गया जो भी बसेरा है बहुत।

उसका कहने को भी कुछ होता नहीं ,
वो जो कहता है कि मेरा है बहुत।

जो बना फिरता मुहाफ़िज़ कौम का ,
जानते सब हैं , लुटेरा है बहुत।

राज़ "तनहा" जानते हैं लोग सब ,
नाम क्यों बदनाम तेरा है बहुत।

No comments: