Sunday, 9 September 2012

राजा नंगा है ( व्यंग्य कविता ) 6 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

राजा नंगा है ( व्यंग्य कविता ) लोक सेतिया

भ्रष्टाचार की बहती गंगा है ,
लेकिन प्रधान मंत्री चंगा है।

सत्यमेव जयते का इक नारा ,
देखो दीवार पे टंगा है।

सब मंत्री निर्वस्त्र हुए  ,
खुद राजा तक भी नंगा है।

पैसे ने किया बस अंधा है ,
देशभक्ति उनका धंधा है।

लोहा बेचा, खाया कोयला ,
कैसा फ़हराया झंडा है।

बिकते नेता  सरकार बिकी ,
काम आता उनका चंदा है।

फस गई सरकार बेचारी है ,
चेहरे पर कालिख कारी है।

सीखा नहीं लेकिन घबराना ,
जब चोरों से ही यारी है।

अब दाग़ सभी लगते अच्छे ,
बेची सब शर्म हमारी है।

सच को हम नहीं छिपाते हैं ,
हम अपना धर्म निभाते हैं।

घोटालों की  ख़बरों को बस ,
कुछ छोटा कर दिखलाते हैं।

मुखप्रष्ट की खबर को हम  ,
कहीं भीतर छपवाते हैं। 

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