Tuesday, 11 September 2012

जय भ्रष्टाचार की ( हास्य व्यंग्य कविता ) 4 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

जय भ्र्ष्टाचार की ( हास्य व्यंग्य कविता ) लोक सेतिया

है अपना तो साफ़ विचार
है लेन देन ही सच्चा प्यार।

वेतन है दुल्हन ,
तो रिश्वत है दहेज
दाल रोटी संग जैसे अचार।

मुश्किल है रखना परहेज़
रहता नहीं दिल पे इख्तियार।

यही है राजनीति का कारोबार
जहां विकास वहीं भ्रष्टाचार।

सुबह की तौबा शाम को पीना
हर कोई करता बार बार।

याद नहीं रहती तब जनता
जब चढ़ता सत्ता का खुमार।

हो जाता इमानदारी से तो
हर जगह बंटाधार।

बेईमानी के चप्पू से ही
आखिर होता बेड़ा पार।

भ्रष्टाचार देव की उपासना
कर सकती सब का उध्धार।

तुरन्त दान है महाकल्याण
नौ नकद न तेरह उधार।

इस हाथ दे उस हाथ ले ,
इसी का नाम है एतबार।

गठबंधन है सौदेबाज़ी ,
जिससे बनती हर सरकार।

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