Tuesday, 11 September 2012

जय भ्रष्टाचार की ( हास्य व्यंग्य कविता ) 4 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

है अपना तो साफ़ विचार
है लेन देन ही सच्चा प्यार !
वेतन है दुल्हन , तो रिश्वत है दहेज
दाल रोटी संग जैसे अचार !
मुश्किल है रखना परहेज़
रहता नहीं दिल पे इख्तियार !!
यही है राजनीति का कारोबार
जहां विकास वहीं भ्रष्टाचार  !
सुबह की तौबा शाम को पीना
हर कोई करता बार बार  !
याद नहीं रहती तब जनता
जब चढ़ता सत्ता का खुमार !!
हो जाता इमानदारी से तो
हर जगह बंटाधार  !
बेईमानी के चप्पू से ही
आखिर होता बेड़ा पार !
भ्रष्टाचार देव की उपासना
कर सकती सब का उध्धार !!
तुरन्त दान है महाकल्याण
नौ नकद न तेरह उधार  !
इस हाथ दे उस हाथ ले ,
इसी का नाम है एतबार  !
गठबंधन है सौदेबाज़ी ,
जिससे बनती हर सरकार !!

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