Thursday, 27 September 2012

मेरी जान , मेरे दोस्त ( कविता ) डॉ लोक सेतिया = 4 6 भाग दो

अक्सर आता है मुझे याद  ,
पहला दिन कालेज का ,
झाड़ियों के पीछे ,
पत्थरों पर बैठे हुए थे हम दोनों ,
कालेज के लान में ,
रैगिंग से हो कर परेशान  ,
कितने उदास थे हम  ,
कितने अकेले अकेले ,
पहले ही दिन कुछ ही पल में ,
हम हो गये थे कितने करीब ! !
अठारह बरस है अपनी उम्र  ,
आज भी लगता है कभी ऐसे ,
कितनी यादें हैं अपनी ,
जो भुलाई नहीं जाती  ,
भूलना चाहते भी नहीं थे हम कभी ,
पहली बार मुझे मिला था दोस्त ऐसा  ,
जो जानता था ,
पहचानता था मुझे वास्तव में  ! !
बीत गये वो दिन कब जाने ,
छूट गया वो शहर ,
उसका बाज़ार ,
गलियां उसकी ,
बरसात में भीगते हुए   ,
हमारा कुछ तलाश करना ,
बाज़ार से तुम्हारे लिये ,
खो गई सपनों जैसी ,
प्यारी दुनिया हमारी  ! !
मगर भूले नहीं हम ,
कभी वो सपने ,
जो सजाए थे मिलकर कभी  ,
अचानक तुम चले गए वहां ,
जहां से आता नहीं ,
लौटकर कोई ! !
मुझे नहीं मिला ,
फिर कोई दोस्त तुम सा  ,
खाली है मेरे जीवन में ,
इक जगह ,
रहते हो अब भी तुम वहां  ,
आज भी सोचता हूँ ,
जाकर ढूंढू  ,
उन्हीं रास्तों पर तुम्हें जहां ,
चलते रहे ,
दोनों यूं ही शामों को ,
अब कहां मिलते हैं ,
इस दुनिया में तुझसे दोस्त  ! !
अब क्या है इस शहर में ,
इस दुनिया में ,
बिना तेरे मेरी जान मेरे दोस्त !!

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