Sunday, 23 September 2012

तीन नये दृश्य ( कविता ) 4 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

उसे निकाल दिया है ,
घर से उन्होंने ,
जो करते हैं,
उसी की बातें  ,
ईश्वर खड़ा ,
चुपचाप कहीं बाहर !!
बहुत व्यस्त हैं लोग  ,
कर रहे तलाश सच की  ,
दफ्तरों में बैठकर   ! !
करते हैं बस यही चर्चा  ,
सच को बचाना है  ,
सच ,
घायल हुआ ,
आता है ,
जब उनके पास ,
करता उनसे सवाल ,
पहचाना मुझे  ! !
कौन हो तुम ,
क्यों आये हो ,
तुम हमारे पास ,
कहते हैं  वो ,
जो बने फिरते हैं ,
सच के  पैरोकार !!
लोकतंत्र का है मंदिर  ,
करते नेता ,
उसका गुणगान ,
जनता दर्शन को तरसी ,
छुपा कहां है वो भगवान ,
आ रही जाने किधर से ,
बचाने की फ़रियाद  ,
कराह रहा लोकतंत्र  ,
मुझको कर दो आज़ाद  ! !
समाप्त होने लगी ,
गूंगो बहरों की ये आशा  ,
देख रहे सारे नेता,
खत्म हो कब तमाशा !!
हारने लगी अब ज़िंदगी  ,
लड़ते लड़ते मौत से ,
अब नहीं आता ,
कोई भी बचाने को उसे ,
हो रहा सामान ,
बस डुबाने को उसे  ,
सहमें सहमें हैं सभी ,
अब हमारे देश में ,
राज रावण हैं  करते ,
राम ही के भेस में  ! !
गावं गावं ,
शहर शहर ,
गली गली है डर ,
लोकतंत्र जिंदा है अभी ,
या वो चुका है मर !!
नाव डुबोते माझी  ,
माली चमन उजाड़ रहे  ,
कैनवास पर चित्रकार ,
कैसी  तस्वीरें उतार रहे ,
आलीशान घरों को  ,
सजाएंगी उनकी तस्वीरें ,
खो बैठेंगी ,
अपना वास्तविक अर्थ ,
रह जाएगा केवल बाकी ,
उनके ऊंचे दामों का इतिहास !!

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