Sunday, 23 September 2012

रास्ते ( कविता ) 4 2 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

मंज़िल की ,
जिन्हें चाह थी ,
मिल गई ,
उनको मंज़िल  ! !
मैं वो रास्ता हूं ,
गुज़रते रहे ,
जिससे हो कर  ,
दुनिया के सभी लोग ,
तलाश में ,
अपनी अपनी ,
मंज़िल की  ,
मैं रुका हुआ हूं ,
इंतज़ार में प्यार की ! !
रुकता नहीं ,
मेरे साथ कोई भी  ,
कुचल कर ,
गुज़र जाते हैं सब ,
मंज़िल की तरफ आगे ! !
सबको भाती हैं मंज़िलें  ,
बेमतलब लगते हैं रास्ते ,
क्या मिल पाती ,
तुम्हें मंज़िलें  ,
न होते जो रास्ते ,
रास्तों को पहचान लो  ,
उनका दर्द ,
कभी तो जान लो !!

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