Sunday, 23 September 2012

हमारा अपना ताज ( कविता ) 4 1 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

मुमताज क्या चाहती थी ,
किसे पता ,
उसे क्या मिला ,
ताज बनने से ,
बनवा दिया ,
एक राजा ने ,
एक महल ,
संगेमरमर का ,
अपनी प्रेमिका ,
की याद में ,
और कह दिया ,
दुनिया ने ,
मुहब्बत की निशानी उसे। 
तुम नहीं बनवा सकोगे ,
ताज महल कोई  ,
मेरी याद में ,
मेरे बाद ,
मगर जानती हूं मैं ,
तुम चाहते हो बनाना  ,
एक छोटा सा घर मेरे लिये   ,
जिसमें रह सकें ,
हम दोनों प्यार से। 
अपना बसेरा बनाने के लिये  ,
हमारी पसंद का कहीं पर ,
हर वर्ष बचाते हो ,
थोड़े थोड़े पैसे  ,
अपनी सीमित आमदनी में से  ,
किसी ताज महल से ,
कम खूबसूरत नहीं होगा  ,
हमारा प्यारा सा वो घर ,
मुमताज से कम ,
खुशकिस्मत नहीं हूं मैं  ,
प्यार तुम्हारा ,
कम नहीं है ,
किसी शाहंशाह से।

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