Friday, 28 September 2012

तीन छोटी छोटी नज़्म ( भाग एक में शामिल ) डॉ लोक सेतिया

जो भूला लोकतंत्र आचार  ,
हुई सत्ता की जय जयकार !
चुना था जिनको हमने ,वही ,
बिके हैं आज सरे-बाज़ार !
लुटा कर सब कुछ भी अपना ,
बचा ली है उसने सरकार !
टांक तो रक्खे हैं लेबल ,
मूल्य सारे ही गए हैं हार !
देखिए उनकी कटु-मुस्कान ,
नहीं लगते अच्छे आसार !
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कहने को तो बयान लगते हैं ,
खाली लेकिन म्यान लगते हैं !
वोट जिनको समझ रहे हैं आप ,
आदमी बेजुबान लगते हैं !
हैं वो लाशें निगाह बानों की ,
आपको पायदान लगते हैं !
ख़ुदकुशी करके जो शहीद हुए ,
देश के वो किसान लगते हैं !
लोग आजिज़ हैं इस कदर लेकिन ,
बेखबर साहिबान लगते हैं !
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बेदिली से दुआ की है ,
तुमने भारी खता की है !
मारकर यूं ज़मीर अपना ,
खुद से तुमने जफ़ा की है !
बढ़ गया है मरज़ कुछ और ,
ये भी कैसी दवा की है !
तुम सज़ा दो गुनाहों की ,
हमने ये इल्तिज़ा की है !
बिक गये चन्द सिक्कों में ,
बात शर्मो-हया की है !

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