Thursday, 20 September 2012

बंधन मुक्त ( कविता ) 3 6 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

                         बंधन मुक्त ( कविता )

खोने के लिए जब  ,
कुछ नहीं बचा ,
सता रहा है फिर डर ,
किस बात का।

रही नहीं जब तमन्ना  ,
कुछ भी पाने की ,
होना है जब मुक्त ,
सभी बंधनों से ,
घबराता है ,
फिर क्यों मन।

अपने ही बुने ,
सारे बंधनों को छोड़  ,
जीवन के ,
अंतिम छोर पर ,
करना है प्रयास ,
कुछ बचे हुए पल  ,
इस तरह जीने का ,
मिल पाए जिसमें ,
मुझे भी आनंद ,
खुली हवा में साँस लेने का।   

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