Saturday, 15 September 2012

कलाकृति ( कविता ) 3 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

राह में पड़ा हो ,
कहीं कोई पत्थर बेजान ,
हर कोई लगा जाता ,
ठोकर उसको  ,
इतराता कितना है देखो ,
ताकत पर अपनी इंसान ! !
उठा कर राह के पत्थर को  ,
ले आना घर अपने कभी तुम ,
तराशना उस पत्थर को ,
अपने हाथों से  ,
देना नई उसको ,
इक पहचान  ! !
देखो करके ये भी काम  ,
मूरत बन जाए ,
जब वो पत्थर ,
कोमल कोमल हाथ तुम्हारे  ,
खुरदरे हो जाएं  ,
और लगें दुखने  ,
सुबह से हो जाए जब शाम  ,
देना तुम तब उसे कोई नाम  ! !
करना फिर खुद से सवाल  ,
जिसे लगाई थी सुबह ठोकर  ,
शाम होते झुका क्यों है  ,
उसी के सामने ही तुम्हारा सर !!

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