Friday, 14 September 2012

सहमा हुआ है बचपन ( कविता ) 3 2 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

उसे ढूंढती रहेंगी ,
मेरी नज़रें ,
शायद अब वो ,
आए न कभी नज़र ,
छुप गया है कहीं ! !
अपने घर गया है ,
अथवा गया स्कूल ,
क्या मालूम  ! !
अभी अभी ,
थोड़ी देर पहले ,
मेरे घर के सामने ,
पार्क के कोने में,
बैठा था ,
सहमा हुआ लगता ,
वो छोटा सा इक बच्चा ! !
पहने हुए स्कूल की वर्दी ,
नंगे पांव ,
पीठ पर लादे  ,
किताबों का बोझ ,
बुलाने पर ,
चाहता था सबसे  ,
दूर भाग जाना ,
मानों डरता हो ,
हमारी दुनिया से ! !
गया था मैं उसके पास  ,
करना चाहता था ,
बातें उससे ,
जानना चाहता था ,
उसकी परेशानी ! !
शायद कुछ कर सकूं  ,
उसके लिए  ,
मगर खामोश रहा  ,
मेरी हर बात पर ,
नहीं दिया था ,
मेरे किसी सवाल का ,
कोई भी जवाब ,
क्यों डरा हुआ है मुझसे ,
इस सारे समाज से  ,
निराश ,
अकेला ,
बेसहारा ,
 देश का ये नन्हा बचपन !!

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