Friday, 7 September 2012

लिखे पत्र तुम्हारे नाम दोस्त ( कविता ) 2 8 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

लिखता रहा ,
नाम तुम्हारे ,
प्रतिदिन मैं पत्र ,
अकेला था जब भी ,
और था ,
बहुत उदास मेरा मन , 
तब नहीं था कोई ,
जो सुनता मेरी बात ,
मैं लिखता रहा ,
बेनाम पत्र  तुम्हारे नाम।
जानता नहीं  ,
नाम पता तुम्हारा ,
मालूम नहीं रहते हो ,
किस नगर की ,
किस गली में तुम दोस्त।
मगर सभी सुख दुःख अपने ,
खुशियां और परेशानियां ,
लिखता रहा सदा तुम्हीं को ,
तलाश भी करता रहा तुम्हें।
फिर आज दिल ने चाहा ,
तुमसे बात करना ,
और मैं लिख रहा हूँ  ,
फिर पत्र नाम तुम्हारे।
सोचता हूँ शायद तुम भी ,
करते हो ऐसा ही मेरी तरह ,
लिखते हो ,
मेरे लिए पत्र तुम भी ,
मिलेंगे हम अवश्य ,
कभी न कभी ,
तो जीवन में ,
और पहचान लेंगे ,
इक दूजे को।
तुम तब पढ़ लेना  ,
मेरे ये सभी पत्र ,
और मुझे दे देना ,
इनके वो जवाब ,
जो लिखते हो ,
तुम प्रतिदिन ,
सिर्फ मेरे लिये  ,
मेरे दोस्त। 

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