Thursday, 6 September 2012

संगीत से शोर होने तक ( कविता ) 2 7 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कभी जब गलियों से ,
गुज़रते हैं  ,
बहुत सारे बच्चे ,
मिल कर एक साथ , 
करते हैं कई आवाज़ें ,
हम सुन नहीं पाते ,
बोल उनके फिर भी ,
समझ लेते हैं हम ,
उनकी ख़ुशी ,
उनकी मस्ती ,
भाता है हम सभी को ,
उन बच्चों का उल्लास ,
भर जाती है ,
हमारे जीवन में ,
नई उमंग ,
देख कर मुस्कुराता बचपन ,
हमें मधुर संगीत सी लगती हैं ,
तब उन बच्चों की आवाज़ें।
डराता है मगर ,
हमें वो कोलाहल ,
जो गूंजता है ,
गाँव गाँव ,
शहर शहर ,
गली गली ,
सभाओं में ,
व्याख्यानों  में ,
बांटता है जो  ,
इंसानों को ,
अपने स्वार्थ की खातिर ,
कभी धर्म,
कभी भाषा ,
कभी क्षेत्रवाद ,
के नाम पर ,
नफरत का ज़हर ,
फैलाता हुआ ,
भर जाता है ,
एक घुटन सी ,
हमारे जीवन में।
खो जाता है ,
जाने कहां ,
बचपन  का ,
मधुर वो संगीत ,
बड़े होने पर ,
क्यों बन जाता है बस ,
इक शोर ,
अच्छा होता ,
दुनिया में सब ,
होते बच्चे ,
अच्छे अच्छे।  

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