Sunday, 9 September 2012

जाने कब मिलोगी तुम ( कविता ) 1 9 डॉ लोक सेतिया

  1 9     जाने कब मिलोगी तुम ( कविता ) डॉ लोक सेतिया 

दूर बहुत दूर
आती है मुझे नज़र
हंसती मुस्कुराती हुई।

छू लूं उसे प्यार से
सोचता हूं मैं 
किसी दिन ले ले मुझे
अपनी बाहों में वो।

कब से मैं उसकी तरफ
बढ़ाता रहा हूं कदम
मगर लगता है जैसे
बढ़ता ही जा रहा है
फासला
हम दोनों के बीच।

एक तरफा
चाहत है शायद
उसने चाहा नहीं मुझे कभी भी
मैंने उसे देखा है
प्यार से मिलते सभी से
रूठी हुई है क्यों मुझ से ही।

लगाया नहीं
मुझे कभी गले
तड़प रहा हूं उसके लिए मैं ,
क्यों भाग रही है मुझसे
दूर और दूर ज़िंदगी। 

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