Thursday, 27 September 2012

ग़ज़ल 1 5 6 ( हमें आज खुद से हुई तब मुहब्बत ) - लोक सेतिया "तनहा"

हमें आज खुद से हुई तब मुहब्बत - लोक सेतिया "तनहा"

हमें आज खुद से हुई तब मुहब्बत ,
किसी दिलरुबा की मिली जब मुहब्बत।

गये भूल जैसे सभी लोग जीना,
कहो जा के उनसे करें सब मुहब्बत।

नहीं मिल रहा है सभी ढूंढते हैं ,
मिलेगा खुदा जब बनी रब मुहब्बत।

चले जो मिटाने वो खुद मिट गये थे ,
कोई लाख चाहे मिटी कब मुहब्बत।

सिखाया है उनको यही बोलना बस,
कहेंगे हमेशा मेरे लब मुहब्बत।

नहीं नफरतों से मिलेगा कभी कुछ ,
उसे छोड़ कर तुम करो अब मुहब्बत।

किसे चाहते हो किसे दिल दिया है ,
कहेगी किसी से किसी शब मुहब्बत।

वही ज़िंदगी प्यार जिसमे भरा हो ,
है जीने का "तनहा" यही ढब मुहब्बत।

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