Monday, 10 September 2012

ग़ज़ल 1 5 4 ( जिधर देखो सभी लगते अकेले ) - लोक सेतिया "तनहा"

जिधर देखो सभी लगते अकेले - लोक सेतिया "तनहा"

जिधर देखो सभी लगते अकेले ,
न जाने क्या हुए दुनिया के मेले।

नहीं चलती हमारी चाल कोई ,
कभी हमने कई थे खेल खेले।

तुम्हारा प्यार मांगा था तुम्हीं से ,
सितम कितने ज़माने भर के झेले।

कभी पाए बिना मांगे थे मोती ,
मिले हैं आज बस मिट्टी के ढेले।

तुम्हें दिल आज कोई दे गया है ,
अमानत आज दिल अपना भी दे ले।

ज़माना बेचता है ख्वाब कितने ,
हकीकत कुछ नहीं सब ख्वाब से ले।

बहुत डर लग रहा है आज "तनहा" ,
ज़रा हाथों में मेरा हाथ ले ले।

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