Tuesday, 18 September 2012

ग़ज़ल 1 4 5 ( कहानी हो ग़ज़ल हो बात रह जाती अधूरी है ) - लोक सेतिया "तनहा"

कहानी हो ग़ज़ल हो बात रह जाती अधूरी है - लोक सेतिया "तनहा"

कहानी हो ग़ज़ल हो बात रह जाती अधूरी है ,
करें क्या ज़िंदगी की बात कहना भी ज़रूरी है।

मिले हैं आज हम ऐसे नहीं बिछुड़े कभी जैसे ,
सुहानी शब मुहब्बत की हुई बरसात पूरी है।

मिले फुर्सत चले जाना , कभी उनको बुला लेना ,
नहीं घर दोस्तों के दूर , कुछ क़दमों की दूरी है।

बुरी आदत रही अपनी सभी कुछ सच बता देना ,
तुम्हें भाती हमेशा से किसी की जीहजूरी है।

रहा भूखा नहीं जब तक कभी ईमान को बेचा ,
लगा बिकने उसी के पास हलवा और पूरी है।

जिन्हें पाला कभी माँ ने , लगाते रोज़ हैं ठोकर ,
इन्हीं बच्चों को बचपन में खिलाई रोज़ चूरी है।

नहीं काली कमाई कर सके "तनहा" कभी लेकिन ,
कमाते प्यार की दौलत , न काली है न भूरी है।

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