Tuesday, 18 September 2012

ग़ज़ल 1 4 0 ( सभी को दास्ताँ अपनी बयाँ करना नहीं आता ) - लोक सेतिया "तनहा"

सभी को दास्तां अपनी बयां करना नहीं आता - लोक सेतिया "तनहा"

सभी को दास्तां अपनी ,  बयां करना नहीं आता ,
कभी आता नहीं लिखना , कभी पढ़ना नहीं आता।

बड़ी ऊंची उड़ाने लोग भरते हैं , मगर सोचें ,
जमीं पर आएंगे कैसे अगर गिरना नहीं आता।

कभी भी मांगने से मौत दुनिया में नहीं मिलती ,
हमें जीना ही पड़ता है ,अगर मरना नहीं आता।

सभी से आप कहते हैं बहुत ही तेज़ है चलना ,
कभी उनको सहारा दो , जिन्हें चलना नहीं आता।

हमें सूली चढ़ा दो अब ,  हमारी आरज़ू है ये ,
यही कहना हमें है पर, हमें कहना नहीं आता।

न जाने किस तरह दुनिया ख़ुशी को ढूंढ़ लेती है ,
हमें सब लोग कहते हैं कि खुश रहना नहीं आता।

तमाशा बन गये "तनहा" , तमाशा देखने वाले ,
तमाशा मत कभी देखो , अगर बनना नहीं आता।