Saturday, 15 September 2012

ग़ज़ल 1 2 2 ( बस यही इक करार बाकी है ) - लोक सेतिया "तनहा"

बस यही इक करार बाकी है - लोक सेतिया "तनहा"

बस यही इक करार बाकी है ,
मौत का इंतज़ार बाकी है।

खेलने को सभी खिलाड़ी हैं ,
पर अभी जीत हार बाकी है।

दिल किसी का अभी धड़कता है ,
आपका इख्तियार बाकी है।

मय पिलाई कभी थी नज़रों से ,
आज तक भी खुमार बाकी है।

दोस्तों में वफ़ा कहां बाकी ,
बस दिखाने को प्यार बाकी है।

साथ देते नहीं कभी अपने ,
इक यही एतबार बाकी है।

हारना मत कभी ज़माने से ,
अब तलक आर पार बाकी है।

लोग सब आ गये जनाज़े पर ,
बस पुराना वो यार बाकी है।

चैन आया कहां अभी "तनहा" ,
कुछ दिले-बेकरार बाकी है।

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