Tuesday, 18 September 2012

ग़ज़ल 1 1 9 ( बेचते झूठ सच के नाम पर ) - लोक सेतिया "तनहा"

बेचते झूठ सच के नाम पर - लोक सेतिया "तनहा"

बेचते झूठ सच के नाम पर ,
बिक गये खुद भी पूरे दाम पर।

कल थे क्या आज क्या हैं हो गये  ,
लोग हैरान इस अंजाम पर।

पी गये खुद उठा कर हम ज़हर ,
नाम अपना लिखा था जाम पर।

ढूंढने पर भी मिलते जो नहीं ,
आ गये  खुद ही देखो बाम पर।

भेजना वन में सीता को पड़ा ,
राम जाने जो बीती राम पर।

हम शिकायत कहां जा कर करें ,
हो रहे ज़ुल्म खासो-आम पर।

इस तरह जी रहा "तनहा" कभी ,
सुबह रोया करेगी शाम पर। 

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