Sunday, 9 September 2012

ग़ज़ल 1 0 ( सभी कुछ था मगर पैसा नहीं था ) - लोक सेतिया "तनहा"

 सभी कुछ था मगर पैसा नहीं था - लोक सेतिया "तनहा"

सभी कुछ था मगर पैसा नहीं था ,
कोई भी अब तो पहला-सा नहीं था।

गिला इसका नहीं बदला ज़माना ,
मगर वो शख्स तो ऐसा नहीं था।

खिला इक फूल तो बगिया में लेकिन ,
जो हमने चाहा था वैसा नहीं था।

न पूछो क्या हुआ ,भगवान जाने ,
मैं कैसा था कि मैं कैसा नहीं था।

जो देखा गौर से उस घर को मैंने ,
लगा मुझको ,वो घर जैसा नहीं था।  

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