Sunday, 19 August 2012

वक़्त के साथ जो चलते हैं संवर जाते हैं ( नज़्म / ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया = 19 भाग एक

वक़्त के साथ जो चलते हैं संवर जाते हैं ,
जो पिछड़ जाते हैं वो लोग बिखर जाते हैं !
जिनको मिलता ही नहीं कोई जीने का सबब ,
मौत से पहले ही अफ़सोस वो मर जाते हैं !
मुश्किलों को कभी आसान नहीं कर सकते ,
उलझनों से ,वो सभी लोग , जो डर जाते हैं !
जो नहीं मिलता कभी जा के किनारों पे हमें ,
वो उन्हें मिलता है जो बीच भंवर जाते हैं  !
हम समझते हैं जिन्हें अपना वो गैरों की तरह ,
पेश आते हैं तो हम जीते जी मर जाते हैं !
गैर अच्छे जो मुसीबत में हमारी आकर ,
दोस्तों जैसा कोई काम तो कर जाते हैं !
आएगा कोई हमारा भी मसीहा बन कर ,
आस में, उम्र तो क्या ,युग भी गुज़र जाते हैं !

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