Sunday, 19 August 2012

अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया = 2 0 भाग एक

अपनी सूरत से ही अनजान हैं लोग ,
आईने से यूँ परेशान हैं लोग  !
बोलने का जो मैं करता हूँ गुनाह ,
तो सज़ा दे के पशेमान हैं लोग !
जिन से मिलने की तमन्ना थी उन्हें ,
उन को ही देख के हैरान हैं लोग !
अपनी ही जान के वो खुद हैं दुश्मन ,
मैं जिधर देखूं मेरी जान हैं लोग !
आदमीयत  को भुलाये बैठे ,
बदले अपने सभी ईमान हैं लोग !
शान ओ शौकत है वो उनकी झूठी ,
बन गए शहर की जो जान हैं लोग
मुझको मरने भी नहीं देते हैं ,
किस कदर मुझ पे दयावान है लोग !

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