Sunday, 19 August 2012

खुद-ब-खुद ज़ख्म भी भर जाते हैं ( नज़्म / ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया = 18 भाग एक

खुद-ब-खुद ज़ख्म भी भर जाते हैं ,
फायदा ज़हर भी कर जाते हैं !
सीख जाते हैं भुलाना उनको ,
बन के जो गैर गुज़र जाते हैं !
ख्वाब तो ख्वाब हैं उनका क्या है ,
नींद जो टूटी बिखर जाते हैं !
एक तिनके का सहारा पा कर ,
डूबने वाले भी तर जाते हैं !
इस से पहले कि उन्हें पहचाने ,
वो जो करना था ,वो कर जाते हैं !
फूल यादों पे चढ़ाओ उनकी ,
जीते जी लोग जो मर जाते हैं ! 

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