Sunday, 19 August 2012

बात दिल में थी जो बता न सके ( नज़्म / ग़ज़ल ) 1 6 डॉ लोक सेतिया = भाग एक

बात दिल में थी जो बता न सके ,
आपबीती उन्हें सुना न सके  !
हमने कोशिश हज़ार की लेकिन ,
बेकरारी ए दिल छिपा न सके !
बातें करते रहे ज़माने की ,
बात अपनी जुबां पे  ला न सके !
चाह कर भी घटा सी जुल्फों को ,
उनके चेहरे से हम हटा न सके  !
हमने पूछा जो बेरुखी का सबब ,
वो बहाना कोई बना न सके  !
जाने वाले ने देखा मुड़. मुड़. कर ,
हम मगर उसको रोक पा न सके ! 

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