Sunday, 19 August 2012

है शहर में बस धुआं धुआं ( नज़्म ) डॉ लोक सेतिया = 1 5 भाग एक

है शहर में बस धुआं धुआं ,
न रौशनी का कोई निशां !
ये पूछती है नज़र नज़र ,
है आदमी का कोई निशां !
समझ सके जो यहाँ है कौन ,
ज़रा सी इक बच्ची की जबां !
कहीं भी दिल लगता ही नहीं ,
जो कोई जाये भी तो कहाँ  !
सुनाएँ कैसे किसी को हम ,
इक उजड़े दिल की ये दास्ताँ !

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