Thursday, 30 August 2012

ग़ज़ल 7 1 ( आई हमको न जीने की कोई अदा )

आई हमको न जीने की कोई अदा ,
हम ने पाई है सच बोलने की सज़ा !
लब पे भूले से किसका ये नाम आ गया ,
जो हुए बज़्म के लोग मुझ से खफ़ा !
हो गया जीना इन्सां का मुश्किल यहां ,
इतने पैदा हुए हैं जहां में खुदा !
हैं कुछ ऐसे भी इस दौर के चारागर ,               ( चारागर = चिकित्सक )
ज़हर भी जो पिलाते हैं कह कर दवा !
हाथ में हाथ लेकर जिएं उम्र भर ,
और होता है क्या ज़िंदगी का मज़ा !
आज "तनहा" हमें मिल गई ज़िंदगी ,
छोड़ मझधार में जब गया नाखुदा  !           ( नाखुदा  = माझी )

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