Thursday, 30 August 2012

ग़ज़ल 6 8 ( हैं उधर सारे लोग भी जा रहे )

हैं उधर सारे लोग भी जा रहे ,
रास्ता अंधे सब को दिखा रहे !
सुन रहे बहरे ध्यान से देख लो ,
गीत सारे गूंगे जब गा रहे !
सबको है उनपे ही एतबार भी ,
रात को दिन जो लोग बता रहे !
लोग भूखे हैं बेबस हैं मगर ,
दांव सत्ता वाले हैं चला रहे !
घर बनाने के वादे कर रहे ,
झोपड़ी उनकी भी हैं हटा रहे !
हक़ दिलाने की बात को भूलकर ,
लाठियां हम पर आज चला रहे !
बेवफाई की खुद जो मिसाल हैं ,
हम को हैं वो "तनहा" समझा रहे ! 

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