Wednesday, 29 August 2012

ग़ज़ल 5 9 ( मिला था कभी इक पैगाम दोस्ती का )

मिला था कभी इक पैगाम दोस्ती का ,
हमें अब डराता है नाम दोस्ती का !
बुझाता नहीं साकी प्यास क्यों हमारी ,
कभी तो पिलाता इक जाम दोस्ती का !
नहीं दोस्त बिकते बाज़ार में कभी भी ,
चुका कौन पाया है दाम दोस्ती का !
करेगा तिजारत की बात जब ज़माना ,
रखेंगे बहुत ऊँचा दाम दोस्ती का !
हमें जीना मरना है साथ दोस्तों के ,
सभी को है देना पैग़ाम दोस्ती का !
वफ़ा नाम देकर करते हैं बेवफाई ,
किया नाम "तनहा" बदनाम दोस्ती का  !

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