Wednesday, 29 August 2012

ग़ज़ल 5 8 ( बिजलियों का भी धड़का है बरसात में )

बिजलियों का भी धड़का है बरसात में ,
क्या गज़ब ढाये काली घटा रात में !
कुछ कहा सादगी से भी उसने अगर ,
राज़ था इक छुपा उसकी हर बात में !
कम नहीं है ज़माने के लोगों से वो ,
बस लिया देख पहली मुलाक़ात में !
राह तकती किसी की वो छत पर खड़ी ,
देखा जब भी उसे चांदनी रात में !
हारते सब रहे इस अजब खेल में ,
लोग उलझे रहे यूँ ही शह-मात में  !

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