Monday, 27 August 2012

ग़ज़ल 5 4 ( महफ़िल में जिसे देखा तनहा सा नज़र आया )

महफ़िल में जिसे देखा तनहा-सा नज़र आया
सन्नाटा वहां हरसू फैला-सा नज़र आया !
हम देखने वालों ने देखा यही हैरत से ,
अनजाना बना अपना ,बैठा -सा नज़र आया !
मुझ जैसे हज़ारों ही मिल जायेंगे दुनिया में ,
मुझको न कोई लेकिन ,तेरा-सा नज़र आया !
हमने न किसी से भी मंज़िल का पता पूछा ,
हर मोड़ ही मंज़िल का रस्ता-सा नज़र आया !
हसरत सी लिये दिल में ,हम उठके चले आये ,
साक़ी ही वहां हमको प्यासा-सा नज़र आया ! 

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