Monday, 27 August 2012

ग़ज़ल 5 2 ( हादिसों की अब तो आदत हो गई है )

हादिसों की अब तो आदत हो गई है ,
ग़म से कुछ कुछ हमको राहत हो गई है !
बस खबर ही आपकी पहचान है अब ,
आपकी कैसी ये शोहरत हो गई है !
किस तरह बाज़ार सारा हम खरीदें ,
उनको तो हर शै की चाहत हो गई है !
थे मुहब्बत करने वालों के जो दुश्मन ,
आज उनको भी मुहब्बत हो गई है !
भूल जाते हैं सभी कसमें वफ़ा की ,
बेवफाई अब तो आदत हो गई है !
लोग अपने आप से अनजान "तनहा" ,
आजकल कुछ ऐसी हालत हो गई है !

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