Sunday, 26 August 2012

ग़ज़ल 0 5 ( पास आया नज़र जो किनारा हमें )

पास आया नज़र जो किनारा हमें ,
मौज ने दूर फेंका दोबारा हमें !
ख़ुदकुशी का इरादा किया जब कभी ,
यूँ लगा है किसी ने पुकारा हमें !
लड़खड़ाये तो खुद ही संभल भी गए ,
मिल न पाया किसी का सहारा हमें !
हो गई अब तो धुंधली हमारी नज़र ,
दूर से तुम न करना इशारा हमें !
दुश्मनों से न इतना करम हो सका ,
हमने चाहा जो मरना न मारा हमें !
हमको मालूम है मौत देगी सुकूं ,
ज़िंदगी से मिला बोझ सारा हमें !
बिन बुलाये यहां आप क्यों आ गये ,
सबने "तनहा" था ऐसे निहारा हमें !  

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