Sunday, 26 August 2012

ग़ज़ल 4 9 ( शिकवा किस्मत का न करना )

शिकवा किस्मत का न करना ,
ग़म से घबरा कर न मरना !
माना ये दुनिया है ज़ालिम ,
तुम न इस दुनिया से डरना !
नफरतों की है ये दल दल ,
तुम इधर से मत गुज़रना !
अश्क पी लेना मगर तुम ,
प्रेम को रुसवा न करना !
तुम न पहचानो जो खुद को ,
इस कदर भी मत संवरना !
हो सका न निबाह तुम से ,
तुम न इस सच से मुकरना ! 

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