Sunday, 26 August 2012

ग़ज़ल 4 3 ( वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिये )

वो जो कहते थे हमको कि सच बोलिए ,
झूठ के साथ वो लोग खुद हो लिए !
देखा कुछ ऐसा आगाज़ जो इश्क का ,
सोचकर उसका अंजाम हम रो लिए !
महफिलें आपकी और तनहा हैं हम ,
यूं न पलड़े में हल्का हमें तोलिए  !
हम तो डर ही गए , मर गए सब के सब ,
आप ज़िंदा तो हैं ,अपने लब खोलिए !
घर से बेघर हुए आप क्यों इस तरह ,
राज़ आखिर है क्या ? क्या हुआ बोलिए !

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