Sunday, 26 August 2012

ग़ज़ल 3 4 ( बहस भ्रष्टाचार पर वो कर रहे थे )

बहस भ्रष्टाचार पर वो कर रहे थे ,
जो दयानतदार थे वो डर रहे थे !
बाढ़ पर काबू पे थी अब वारताएं ,
डूब कर जब लोग उस में मर रहे थे !
पी रहे हैं अब ज़रा थक कर जो दिन भर ,
मय पे पाबंदी की बातें कर रहे थे !
खुद ही बन बैठे वो अपने जांचकर्ता ,
रिश्वतें लेकर जो जेबें भर रहे थे !
वो सभाएं शोक की करते हैं ,जो कल ,
कातिलों से मिल के साज़िश कर रहे थे !
भाईचारे का मिला इनाम उनको ,
बीज नफरत के जो रोपित कर रहे थे !

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