Tuesday, 21 August 2012

ग़ज़ल 2 8 ( राहे जन्नत से हम तो गुज़रते नहीं )

राहे जन्नत से हम तो गुज़रते नहीं ,
झूठे ख्वाबों पे विश्वास करते नहीं !
बात करता है किस लोक की ये जहां ,
लोक -परलोक से हम तो डरते नहीं !
हमने देखी न जन्नत न दोज़ख कभी ,
दम कभी झूठी बातों का भरते नहीं !
आईने में तो होता है सच सामने ,
सामना इसका सब लोग करते नहीं !
खेते रहते हैं कश्ती को वो उम्र भर ,
नाम के नाखुदा पार उतरते नहीं !

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