Sunday, 26 August 2012

ग़ज़ल 2 3 ( न आयें अगर वो , करें क्या बताओ )

न आयें अगर वो , करें क्या बताओ ,
वो आयें ,बहाना कुछ ऐसा बनाओ !
कशिश उनके दिल में भी पैदा करो तुम ,
उन्हें , वरना तुम ,कर के कोशिश भुलाओ !
मुहब्बत कभी इस तरह भी हुई है ,
बुलायें तुम्हें पास तुम दूर जाओ !
उसे सिज्दा कर के हुए हम तो काफ़िर ,
अगर हो सके उस खुदा को मनाओ !
जो उम्मीद टूटी तो फिर होगी मुश्किल ,
न यूँ दिल को झूठे दिलासे दिलाओ !
जगह दो न दो अपने दिल में हमें तुम ,
बस इक बार हमसे नज़र तो मिलाओ !
वो अनजान बनते हैं सब जान कर भी ,
उन्हें हाल-ए-दिल तुम न "तनहा" सुनाओ ! 

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