Sunday, 26 August 2012

ग़ज़ल 2 2 ( तुम ही न मिले एक ज़माना तो मिला है )

तुम ही न मिले एक ज़माना तो मिला है ,
ये मेरी वफाओं का मिला खूब सिला है !
इक बूँद को तरसा किये हम प्यास के मारे ,
ऐसे तो बरसता न ये सावन से गिला है !
आती रही यूं तो बहारें ही बहारें ,
बिन तेरे मगर दिल का कोई फूल खिला है !
मिल जाते हैं हमदर्द यहां कहने को लेकिन ,
बांटे भी वो हम किससे जो ग़म तुम से मिला है !
हंसता है खुदा जाने ये क्यूं हम पे ज़माना ,
आंसू कोई शायद तेरी पलकों पे ढला है !
दो पल ही गुज़ारे थे तेरे साथ ब-मुश्किल ,
इक उम्र बड़ी पा के मगर "लोक" चला है  !

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