Sunday, 26 August 2012

ग़ज़ल 2 1 ( रंक भी राजा भी तेरे शहर में )

रंक भी राजा भी तेरे शहर में ,
मैं कहूं यह  बात तो किस बहर में !
नाव तूफां से जो टकराती रही ,
वो किनारे जा के डूबी लहर में !
ज़ालिमों के हाथ में इंसाफ है ,
रोक रोने पर भी है अब कहर में !
मर के भी देते हैं सब उसको दुआ ,
जाने कैसा है मज़ा उस ज़हर में !
क्या भरोसा आप पर "तनहा" करें ,
आप जाते हो बदल इक  पहर में !

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