Sunday, 26 August 2012

ग़ज़ल 1 9 ( उस को यूँ हैरत से मत देखा करो )

उस को यूं हैरत से मत देखा करो ,
ज़िंदगी तो हादिसों का नाम है !
जिसको ठुकराने चले तुम बिन पढ़े ,
दोस्ती ही का तो वो पैगाम है !
उठ गया अब तो जहां से एतबार ,
शहर वालों में ये चर्चा आम है  !
काफिले में चल रहे हैं साथ साथ ,
अपनी अपनी फिर भी तनहा शाम है !
देख कर लाशें कभी रोते नहीं ,
खोदना ही कब्र उनका काम है !
सत्यवादी कह के हंसता है जहां ,
बस यही सच कहने का ईनाम  है !

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