Sunday, 26 August 2012

ग़ज़ल 1 8 ( बस मोहब्बत से उसको शिकायत रही )

बस मोहब्बत से उसको शिकायत रही ,
इस ज़माने की ऐसी रिवायत रही !
इक हमीं पर न थी उनकी चश्मे करम ,
सब पे महफ़िल में उनकी इनायत रही !
हम तो पीते हैं ये ज़हर ,पीना न तुम ,
उनकी औरों को ऐसी हिदायत रही !
उड़ गई बस धुंआ बनके सिगरेट का ,
राख सी ज़िंदगी की हिकायत रही  !
भर के हुक्का जो हाकिम का लाते रहे ,
उनको दो चार कश की रियायत रही  !

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