Tuesday, 21 August 2012

ग़ज़ल 14 ( फिर कोई कारवां बनायें हम )

फिर कोई कारवां बनायें हम ,
या कोई बज़्म ही सजायें हम  !
छेड़ने को नई सी धुन कोई ,
साज़ पर उंगलियां चलायें हम  !
आमदो रफ्त होगी लोगों की ,
आओ इक रास्ता बनायें हम  !
ये जो पत्थर बरस गये  इतने ,
क्यों न मिल कर इन्हें हटायें हम  !
है अगर मोतिओं की हमको तलाश ,
गहरे सागर में डूब जायें  हम  !
दर बदर करके दिल से शैतां को ,
इस मकां में खुदा बसायें  हम  !
हुस्न में कम नहीं हैं कांटे भी ,
कैक्टस सहन में सजायें  हम  !
हम जहाँ से चले वहीँ पहुंचे ,
अपनी मंजिल यहीं बनायें हम  !

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