Sunday, 26 August 2012

ग़ज़ल 1 2 ( बहती इंसाफ की हर ओर यहाँ गंगा है )

बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है ,
जो नहाये न कभी इसमें वही चंगा है !
वह अगर लाठियां बरसायें तो कानून है ये ,
हाथ अगर उसका छुएं आप तो वो दंगा है !
महकमा आप कोई जा के  कभी तो देखें ,
जो भी है शख्स उस हम्माम में वो नंगा है !
ये स्याही के हैं धब्बे जो लगे उस पर ,
दामन इंसाफ का या खून से यूँ रंगा है !
आईना उनको दिखाना तो है उनकी तौहीन ,
और सच बोलें तो हो जाता वहां पंगा है !
उसमें आईन नहीं फिर भी सुरक्षित शायद ,
उस इमारत पे हमारा है वो जो झंडा है  !
उसको सच बोलने की कोई सज़ा हो तजवीज़ ,
"लोक" राजा को वो कहता है निपट नंगा है ! 

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