Wednesday, 22 August 2012

ग़ज़ल 8 4 ( अब सुना कोई कहानी फिर उसी अंदाज़ में )

अब सुना कोई कहानी फिर उसी अन्दाज़ में ,
आज कैसे कह दिया सब कुछ यहां आगाज़ में !
आप कहना चाहते कुछ और थे महफ़िल में ,पर ,
बात शायद और कुछ आई नज़र आवाज़ में !
कह रहे थे आसमां के पार सारे जाएंगे ,
रह गई फिर क्यों कमी दुनिया तेरी परवाज़ में !
दे रहे अपनी कसम रखना छुपा कर बात को ,
क्यों नहीं रखते यकीं कुछ लोग अब हमराज़ में !
लोग कोई धुन नई सुनने को आये थे यहां ,
आपने लेकिन निकाली धुन वही फिर साज़ में !
देखते हम भी रहे हैं सब अदाएं आपकी ,
पर लुटा पाये नहीं अपना सभी कुछ नाज़ में !
तुम बता दो बात "तनहा" आज दिल की खोलकर ,
मत छिपाओ बात ऐसे ज़िंदगी की राज़ में  !

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