Wednesday, 22 August 2012

ग़ज़ल 5 1 ( राही नई पुरानी उसी रहगुज़र के हैं )

राही नई पुरानी उसी रहगुज़र के हैं ,
जिस पर निशान गालिबो दागो जिगर के हैं !
जाने कहां कहां के हमें जानते हैं लोग ,
हमको तो ये गुमां था कि तेरे नगर के हैं !
वो काफिले तो जानिबे मंज़िल चले गये  ,
बाकी रही है गर्द वहां हम जिधर के हैं !
मिलते हैं अजनबी की तरह लोग किसलिये  ,
हम सब तो रहने वाले उसी एक घर के हैं !
ये दर्दो ग़म भी खुद को करें किस तरह जुदा ,
रिश्ते हमारे इनसे तो शामो सहर के हैं !
साहिल की रेत को भी भला इसकी क्या खबर ,
बिखरे पड़े हैं जो ये महल किस बशर के हैं  !

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